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विधानसभा चुनाव 2017 : बढ़ रहा है प्रदेश की सियासत का पारा...

प्रदेश की राजधानी में विधानसभा चुनाव की सियासी गर्मी ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया है.सभी छोटे-बड़े राजनीतिक दल जोर आज़माइश करने के लिए अपनी जीत की रणनीति को अमलीजामा पहनाने लग गए हैं.सबसे अधिक उत्साहित समाजवादी पार्टी है जोकि अपने 5 साल के कार्यकाल में हुए विकास के नाम पर वोट माँगने की तैयारी में है. राजधानी में जगह-जगह लगे विशालकाय होर्डिंग्स इस बात की तरफ ही इशारा कर रहे हैं. प्रत्याशियों की सूची भी ज़ारी करने के पीछे सत्ता पक्ष की मंशा पहले ही से बढ़त बना लेने की है. भाजपा के कार्यालयों में प्रदेश की सियासत को गरमाने के लिए बैठकों का दौर शुरू हो चला है. केन्द्रीय मंत्रियों का आवागमन तेज़ हो गया है. मंथन किया जा रहा है कि इस विधानसभा चुनाव में मोदी के विकास के नाम पर भरोसा किया जाये की राम के नाम पर. अगर बसपा की तरफ देखें तो वो अभी भी ऊहापोह की स्थिति में है. कि इस बार चुनाव का मुद्दा क्या रहे. बसपा उत्तर-प्रदेश में लोकसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त की टीस से उबर नहीं पायी है. बहुत फूंक-फूंक के क़दमों को आगे बढ़ाना चाहती है. बसपा सुप्रीमो ने जातीय समीकरण के तहत रोहित वेमुला के मुद्दे को लाकर उसका इस्तेमाल करके प्रदेश की सियासत को गरमाने के प्रयास में थीं लेकिन उन्हें इसमें नफ़ा नहीं मिल पाया तभी से बसपा एकदम साइलेंट फीचर में चली गयी है. कांग्रेस की बात करें तो वो खाली हाथ है. उसके पास अगर कुछ होता तो वो प्रशांत किशोर (पीके) का सहारा न लेती. कोई भी ऐसा कद्दावर नेता कांग्रेस के पास नहीं है जिसको प्रदेश का चेहरा बनाकर पेश कर पाए. जगदम्बिका पाल के भाजपा में चले जाने के बाद प्रमोद तिवारी ही एक कांग्रेसी नेता थे जो कुछ कर सकते थे, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर ज़िम्मेदारी सौंपने के तहत राज्यसभा के रास्ते दिल्ली बुला लिया. कांग्रेस को रीता बहुगुणा जोशी पर भरोसा नहीं है कि वो कुछ फ़ायदा पहुंचा सकती हैं. अगर आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र देखा जाए तो प्रदेश की सत्ताधारी अखिलेश सरकार सभी राजनीतिक दलों के मुकाबले फिल वक़्त अपनी बढ़त बनाए हुए है. सबसे पहले अपने विधानसभा प्रत्याशियों की सूची ज़ारी करके यही सन्देश देना चाहा है कि प्रदेश में वो फिर आ रहे हैं. अंतिम समय में सपा ने विकास को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ने के संकेत देकर उन सियासी दलों को चौंका दिया है, जो सोच रहे थे की सपा जाति और धर्म की राजनीति का रास्ता अपनाएगी. बसपा इसीलिए आश्वस्त थी कि जाति और धर्म की राजनीति को मुद्दा बनाया गया तो उसकी जीत सुनिश्चित है. लेकिन प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री भी लोकसभा चुनाव में मोदी के विकास के मुद्दे से मिले दर्द को भूल नहीं पाए थे. एक मंझे हुए नेता की तरह युवाओं के नेता बन चुके अखिलेश ने विकास को अपना कर सूझबूझ का परिचय दिया है. बहुत नहीं जो कुछ विकास कार्य प्रदेश की अखिलेश सरकार ने किये हैं, उन्हें लेकर वो जनता से वोट माँगने का अधिकार रखती है. सच भी है कि कई दशकों से धर्म के नाम पर और फिर जाति के नाम पर ही उत्तर-प्रदेश में चुनाव हुए हैं. जिसकी वजह से प्रदेश की जनता यह नहीं पता कि विकास क्या होता है, लेकिन भारी उलटफेर करते हुए समाजवादी पार्टी ने जाति और धर्म मुद्दों से किनारा कर विकास को अपना चुनावी हथियार बना प्रदेश को सही दिशा दी है. अगर देखा जाए तो सपा को विकास के मुद्दे पर नफा ही नफा है. भाजपा से छीने इस मुद्दे को लेकर कितना जनता के करीब जा पाती है यह बाद में ही मालूम पडेगा. प्रदेश के भाजपाई राम भरोसे चुनाव लड़ने की फ़िराक में थे, लेकिन दिल्ली हाई कमान से उन्हें इस बात के लिए हरी झंडी नहीं मिल सकी. मोदी अपनी 'सबका साथ, सबका विकास' की छवि पर कट्टरपंथी होने की मुहर नहीं लगवा सकते थे. अब प्रदेश में भाजपा की जीत का सारा दारोमदार प्रधानमंत्री मोदी पर ही है. हिंदुत्व से किनारा करने के लिए समझाये जाने के बावजूद कुछ भाजपा सांसदों ने एक न सुनी और हिंदुत्व के मुद्दे पर सतहे बयानों की बौछार करते रहे. अगर ये सब मोदी के विकास कार्यों को लेकर आमजन के पास जाते रहते तो प्रदेश में भाजपा की स्थिति सबसे बेहतर होती. शायद राम भरोसे जीतने वालों को मोदी भरोसे जीतना रास नहीं आया, और ये नकारे ही रहे, जिसका नुकसान उठाने के लिए बीजेपी के नेताओं को तैयार रहना होगा. सपा की देखा-देखी शायद प्रदेश के भाजपाई भी विकास को ही चुनावी हथियार बनाएगे, जोकि लोकसभा चुनाव में मोदी का ब्रह्मास्त्र बन गया था. बसपा ने अपनी राजनीति की पारी की शुरुआत ही जाति की राजनीति से की थी. इसमें आंशिक सफलता पाने वाली बसपा को सहारे की ज़रुरत पड़ी थी, भाजपा के सहारा लिया लेकिन बसपा सुप्रीमो को रास नहीं आया था, लेकिन इस गंठ-जोड़ का नफ़ा बसपा ले गयी और भाजपा को कुछ प्रतिशत सवर्ण वोटों से हाथ धोना पड़ा.

जो सवर्ण बसपा से दूरी बनाए रखना चाहते थे, उन्हें सत्ता सुख का चस्का ऐसा लगा की वो 'सर्व धर्म हिताय, सर्व धर्म सुखाय' के नारे को अपना कर बसपा दामन थामकर चुनाव मैदान में उतारे, इसका परिणाम स्वरुप मायावती पूर्ण बहुमत से प्रदेश की सत्ता पर काबिज़ होने में सफल रहीं थीं. लोकसभा चुनाव में मोदी की विकास की सुनामी ने बसपा को प्रदेश में झकझोर कर रख दिया,इसकी किसी भी आम आदमी को उम्मीद नहीं थी. दक्षिण भारत से रोहित वेमुला के मुद्दे को दिल्ली के रास्ते उत्तर भारत लाने का बसपा सुप्रीमो को न के बराबर लाभ मिला. इसके उलट सवर्ण मतदाता और टिकटार्थियों को भी बिदका दिया. मोदी से लोकसभा चुनाव में मिली हार की खार निकालने के लिए ही बसपा सुप्रीमो राज्यसभा में रोहित वेमुला के मामले में एचआरडी मंत्री स्मृति इरानी से जा भिड़ीं. इस भिडंत में मेरी समझ से बसपा सुप्रीमो को नफ़ा कम नुकसान अधिक हुआ. इस बात को विधानसभा चुनाव नतीजे ही साबित कर पायेंगे. यहाँ यह कह सकते हैं कि मायावती राजनीति की मंझी हुई खिलाड़ी होने के बाद भी ऐसी गलती कैसे कर गयी. क्या वो ये भूल गयीं थीं कि जाति के नाम पर मांगे गए वोट प्रदेश में सत्ता पर काबिज़ होने के लिए पर्याप्त नहीं रहे हैं. अभी भी उनके पास डैमेज कंट्रोल के लिए लगभग दस-ग्यारह महीने का वक़्त है. कितना कुछ कर पाएगी ये २०१७ में विधानसभा चुनाव के बाद पता चलेगा. एक काम सभी गैर भाजपाई दलों के मुखियाओं ने अपनी पार्टी हित में किया कि जो प्रदेश में मरणासन्न कांग्रेस से हाथ नहीं मिलाया. शायद इस बात का एहसास कांग्रेसियों को भी हो चला है कि अभी भी जनता उन्हें स्वीकार नहीं करेगी. इसीलिए कांग्रेस प्रशांत किशोर के माध्यम से मतदाता को पटाने की जुगत में है. यह बात पीके भी बेहतर जानते हैं कि यूपी में कुछ कर पाना उनके लिए टेढ़ी खीर साबित होगा. उनकी राजनीतिक सूझ-बूझ और रणनीति की असली परीक्षा यहीं पर होनी है. पीके भी समझ जायेंगे कि उन्होंने यूपी का बयाना गलत ले लिया. उत्तर प्रदेश को अक्सर हम मित्र लोग उलटा प्रदेश कहते हैं, क्योंकि यहाँ का मतदाता कब क्या कर गुजरे कहा नहीं जा सकता है. इस बात का अंदाजाइस बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश की जनता ने २०१२ के विधान सभा चुनाव में भाजपा के ४१ विधायकों जिताये थे,लेकिन लोकसभा चुनाव में मोदी के विकास की बात मतदाताओं को इतनी अच्छी लगी कि लोकसभा की 71+2=73(अपना दल) नरेंद्र मोदी की झोली में डाल दीं, और बीजेपी को यूपी में ऐतिहासिक जीत दर्ज करवा दी. कांग्रेस कुछ भी अच्छा कर लेती है वो श्रेय पीके को ही जाएगा. कुल मिलाकर यूपी का घमासान बहुत ही रोचक होने वाला है. बीजेपी, सपा और बसपा त्रिकोणीय लड़ाई के लिए तैयार रहें. सर्वे को में खरा नहीं मानता हूँ. ये कभी-कभी किसी दल का फ़ायदा कम नुक्सान ज़्यादा कर देते हैं. सपा के लिए अखिलेश तो बसपा के लिए मायावती मुख्यमंत्री का चेहरा होंगी. भाजपा ने अभी मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर नहीं लगाई है, क्योंकि हाईकमान जानता है. यूपी भाजपाई किसी एक नेता से से खुश नहीं रहेंगे. भितरघात से बचे रहने के लिए यही सबसे अच्छा तरीका है कि चुनाव जीतो मुख्यमंत्री खुद चुनो. केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के कुछ दिन पहले दिए बयान को देखें तो हो सकता है भाजपा वरुण गांधी पर दाँव खेल सकती है, जो लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भी उत्तर-प्रदेश में ही सक्रिय रहे और प्रदेश की गरीब जनता के पास स्वयं चल कर गये और उसका हाल-चाल लिया. वरुण गांधी का प्रदेश में ही सक्रिय रहना भाजपा की मिशन २०१७ की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है. जानकार ये सवाल उठा सकते हैं कि वो राजनीति में परिपक्व नहीं हैं तो उन्हें समाजवादी पार्टी की तरफ देखना चाहिए. २०१२ का चुनाव युवा अखिलेश यादव ने अपने बल-बूते जीता था. जब सपा मुखिया कुछ ऐसा प्रयोग कर सकते हैं तो नरेंद्र मोदी क्यों नहीं महाराष्ट्र में फड़नवीस हरियाणा में खट्टर तो यूपी वरुण को लाकर चौंका सकते हैं. कांग्रेस के पास कोई ऐसा कद्दावर नेता ही नहीं है जो उसको चुनावी नैय्या पार लगाए, तो मुख्यमंत्री चेहरा तो बहुत दूर की कौड़ी है. कांग्रेस को अब नकारात्मक राजनीति को तिलांजलि देनी पड़ेगी तभी सर्वाइव कर पाएगी. इस बात को कांग्रेस को स्वीकारने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी ने ही देश को स्वच्छ राजनीति की ओर ले जाने की पहल की है. इसमें उन्हें अपार सफलता मिली है. अपनी कमीज़ को दूसरे की कमीज़ गन्दी करके उजाला दिखाना अब नहीं चलेगा. इसी का नतीजा है कि १०० साल पुरानी कांग्रेस को बिहार की तरह यूपी में भी एक अदद बैसाखी की ज़रुरत थी, जो न मिल सकी. यूपी के चुनाव परिणाम चौंकाने वाले साबित होंगे.जो दल अब किन्तु-परन्तु में पड़ा वो सत्ता से दूर होता चला जाएगा. वैसे ये अत्यंत सुखद है कि प्रदेश में जाति-धर्म की राजनीति पर विकास के मुद्दे को बढ़त मिल चुकी है जो उत्तर-प्रदेश की जनता के लिए शुभ संकेत हैं. किसके सर पर होगा ताज ये भविष्य के गर्भ में है. । (Aawaamee Lehar)




उत्तर प्रदेश:किसके सर पर ताज...?

प्रदेश में आसन्न विधानसभा चुनाव के चलते राजनीति का परा चढ़ने लगा है. सभी बड़े छोटे राजनीतिक दलों ने जीत के लिए अपनी -अपनी गोटें बिछानी शुरू कर दी हैं. सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी मुस्लिम और यादव मतदाताओं पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करने का मन बनाये हुए जान पड़ रही है. सत्ता की पारी की शुरुआत ही सपा ही इस वोट बैंक को पटाने ने से ही की थी. लेकिन उसको इसमे नफा कम नुकसान दिखाई देने के चलते क़दम पीछे खीचने पड़े. सोच को बदलने के पीछे सपा को लोकसभा में मिली करारी हार ने किया. पूर्ण बहुमत से उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने वाली सपा को लोकसभा की मात्र ५ सीटों से ही संतोष करना पड़ा. ये सभी सपा मुखिया के परिवार से ही थे. यह दर्द अक्सर मुलायम सिंह की बातों में छलकता रहा है. सपा मुखिया को इस बात की ख़ुशी ज़रूर रही होगी कि मोदी की विकास की लहर में बसपा की तरह प्रदेश से उनका सूपड़ा साफ़ नहीं हुआ. कांग्रेस इस चुनाव में सोनिया और राहुल के ना हारने की ही ख़ुशी मनाती रही. वहीँ मोदी के नेतृत्व में भाजपा अगले-पिछले सभी रिकार्ड तोड़ते हुए ७३(२ अपना दल) प्रत्याशियों को संसद में पंहुचा दिया. इसी के बाद सपा ने अपनी रणनीति बदलते हुए विकास को अपना ब्रह्मास्त्र बनाने प्रयास किया है, अनेकों विकास की योजनाओं को अमलीजामा पहनाना शुरू किया है, ये कितना सफल होगा ये विधानसभा चुनाव परिणामों से पता चलेगा. रही बात प्रदेश की पार्टी बसपा की तो वो इन परिणामों से सन्नाटे में आ गयी थी, ऐसी दुर्गतिपूर्ण हार भी हो सकती है इसकी उम्मीद सुश्री मायावती भी नहीं थी. बसपा ने इस पर चिंतन-मनन करने के लिए अपने चारों तरफ इतनी ऊँची दीवारे उठा दी ताकि अन्दर की बातें बाहर ना जा सकें. किसी उप चुनाव और चुनाव में हिस्सा नहीं लिया यह बसपा सुप्रीमों का एक मंझे हुए राजनीतिकबाज़ का एक सही फैसला साबित हुआ है. बहुत धीरे-धीरे बसपा ने फिर से बिखरी हुयी पार्टी को फिर से बनाना शुरू किया, किसी भी तरह की कोई भी बयानबाजी लोकसभा चुनाव के बाद ना सुश्री मायावती और ना ही किसी बसपाई ने की. इसी का लाभ बसपा को फिर से उठ खड़े होने में विधानसभा चुनाव में मिलने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है. बसपा सुप्रीमो अपने दलित मतदाताओं पर फिर से भरोसा करके चुनाव मैदान में उतारेगी इसका पूरा लाभ मिलने की उम्मीदों से इनकार नहीं किया जा सकता है. सुश्री मायावती भी इस गलती को मान चुकी होंगी कि सभी विपक्षियों की तरह ही उन्होंने मोदी पर हमला करके लोकसभा में नुक्सान ही उठाया है., अगर वो सपा के खिलाफ चुनाव लड़तीं तो परिणाम शायद कुछ और ही होते, यब बात शायद अब समझ में आ रही होगी. बसपा मुखिया को अब यह बात समझ लेनी चाहिए की मोदी पर हमला करने में नफ़ा कम नुक्सान ज़्यादा है.

इसी के चलते बसपा ने अपने मतदाताओं को बटोरना और टटोलना शुरू कर दिया है. उनमें यह विश्वास जगाना ज़रूरी होगा की हम साथ-साथ हैं. दूसरी जातियों को पटाने के लिए बसपा से आया ये सन्देश अब हम स्मारक नहीं बनाएंगे कुछ इसी तरफ इशारा कर रहा है. बसपा सुप्रीमो के नपे तुले बयानों से साफ़ लगता है कि अब उन्हें घर बचाने की चिंता ज़्यादा है. उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला सुश्री मायावती के आत्म विश्वास को फिर से पा लेने की तरफ इशारा कर रहा है. ये कांग्रेस के भविष्य बदने वाले हाथ को ना थामने कीबात को जतलाता है. प्रदेश में कांग्रेस को बढ़त पाने के लिए कई दशकों से बैसाखी की ज़रुरत रही है जिसकी दरकार आज भी है. बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेसी प्रत्याशियों की जीत राजद और जदयु से मिले सहारे के चलते मिल गयी. कांग्रेस का बिहार चुनाव के कुछ समय पहले बनाने वाले महा गठबंधन में शामिल होने का तपाक से लिया फैसला सपा का यूपी के चुनावों में साथ पाने को लेकर भी था. लेकिन सपा मुखिया ने अपने ही बनाए महागठबंधन में शामिल ना होने के फैसले ने राजनीति की समझ रखने वालों को कुछ समय के लिए आश्चर्य में डाल दिया था. सपा मुखिया ने यही बेहतर समझा की समधी का घर बसाने के बनिस्बत अपना घर बचाना ज़रूरी है, इस फैसले ने कांग्रेस को डूबते हुए मिलाने वाला तिनके का सहारा अब प्रदेश विधानसभा चुनाव में नहीं मिल पाने की उम्मीदें ख़त्म सी हो चुकी हैं.कांग्रेस को प्रदेश में अपने अच्छे- बुरे कार्यों पर ही चुनाव लड़ना है. ८० में से दो सांसदों का होना कांग्रेस की दुर्गति को ही दर्शाता है. प्रदेश की जनता को कांग्रेस यह बात किस तरह से समझाएगी कि उसने संसद के अन्दर मोदी सरकार के सभी फैसलों का विरोध क्यों किया. अगर जनता की भलाई के लिए फैसले थे तो केंद्र सरकार को ले लेने दिए होते, अगर फैसले जनता की भलाई में नहीं थे तो उन्हें जनता ख़ुद सबक सिखाती. इसका जवाब कांग्रेस को देना बहुत भारी पड़ने वाला है. प्रदेश में कांग्रेस किस मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी ये तो इनके आलाकमान ही बता सकेंगे, या फिर अपने नेताओं को चुनाव मैदान में छाया युद्ध करने के लिए छोड़ दिया जाएगा, जैसा की प्रदेश में अब तक करते आ रहे हैं.रही बात विधानसभा सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की,जोकि ७३ सांसदों के जीतने से अति उत्साहित है. अगर वो लोकसभा की सफलता का ८० प्रतिशत भी परिणाम पा जायेगी तो उसके लिए उत्तर प्रदेश में सरकार बनाना आसान होगा. उत्तर-प्रदेश के भाजपाइयों ने पूरी तरह से मन बना लिया है कि हिंदुत्व के मुद्दे पर ही चुनाव लड़ेंगे. मोदी के विकास के मुद्दे ने प्रदेश में ७३ प्रत्याशियों को जीत की दहलीज पर पहुंचाने में मुख्य भूमिका निभायी थी क्या प्रदेश के भाजपा नेता इन्हीं परिणामों को पा सकेंगे. अगर मोदी प्रदेश में विकास की जगह हिंदुत्व की बात जनता से करेंगे तो इस को कितनी मान्यता मिलाती है ये आने वाला वक़्त बताएगा. कुल लब्बो-लुआब ये है की सभी दलों ने अपनी-अपनी बिसातें बिछा दी हैं शह और मात का खेल शुरू होने में वक़्त नहीं बचा है किसका पलड़ा भारी होगा ये भविष्य के गर्भ में है. । (Aawaamee Lehar)




भारत -पाकिस्तान सम्बन्ध-
अब गेंद पाक के पाले में

केंद्र में जिस प्रचंड बहुमत से एनडीए की सरकार बानी। नरेंद्र मोदी ने यह साबित कर दिया कि गुड वर्क करने वाले के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। सत्ता पर काबिज होने के बात जिस तरह से केंद्र सरकार ने मोदी के नेतृत्व कार्य शुरू किया उसको देख कर यही जान पड़ता है क़ि उन्हें इस बात की निश्चित तौर पर उम्मीद थी कि वो प्रधानमन्त्री बनेंगे। अगर केंद्र के लगभग २ वर्षों में लिए गए फैसलों पर नज़र डाले तो यह बात साबित होती जान पड़ती है। विश्व समुदाय में मोदी ने जिस तरह से भारत की हनकदार उपस्थिति दर्ज़ करायी है, यह भारतवासियों के लिए गौरव की बात है। मोदी का ही दमखम था कि देश अब तक चली आ रही छिछली राजनीति को दरकिनार कर उन्होंने दूसरों की खींची लकीर को छोटा न करके उससे भी बड़ी लकीर खींचने का ही प्रयास किया। देश हो या विदेश पर बनायी गयी रणनीति की सफलता की कसौटी खरे ही उतरे हैं। विश्व समुदाय के समक्ष जिस तरह से भारत का पक्ष रखते रहे, बहुत ही सराहनीय है। मोदी के विरुद्ध जिस प्रकार की सतही राजनीति का कांग्रेस ने परिचय दिया था, उन्हें चाय वाला हत्यारा कह कर सम्बोधित किया। इस घटिया शब्दों का मोदी ने विदेशों में जाकर चरण वंदना करने और करवाने वाले कोंग्रेसियों को इसका मुंहतोड़ जवाब दिया। आज पाकिस्तान जैसे परंपरागत दुश्मन को भी या जतला दिया कि असंभव कुछ भी नहीं है।इसीलिए वो भी पूर्व हुई गलतियों से सबक लेकर आज

भारत को महत्त्व देनें लगा है|अपने आप सफल प्रधानमंत्री साबित के लिए नवाज शरीफ भी भारत की तरफ से बढ़े दोस्ती के हाथ को थामने के प्रति तत्पर दिखलायी दिए।पाकिस्तान की अवाम को भी समझ में आने लगा है कि दुश्मनी के बनिस्बत पडोसी देश से दोस्ती ज़्यादा फायदे की है। पाकिस्तान के झंडाबरदार नेताओं को भी यह बेहतर समझ आ चुका है कि आतंकवाद की खेती से मौत की ही पैदावार की जा सकती है, पेट भरने के लिए अन्न की नहीं। फेस बुक पर एक पाकिस्तानी से कमेंट ऑप्शन पर बात हुई तो उनकी बातों में वहां की अवाम की सोच दिखलायी पड़ी। वो बहुत ही विनम्रता से अपनी बात को रख कर यही कहते जा पड़े कि पाकिस्तान की अवाम भी भारत दोस्ताना सम्बन्ध चाहती है। शायद पाक की जनता को भी लगाने लगा है, ताक़तवर पडोसी को अपनाने का वक़्त आ गया है क्योंकि पाकिस्तान के सब से नज़दीक जो संपन्न देश है वो भारत ही है। पाकिस्तान में आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों को लगने लगा है कि भारत से अगर व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हो गए तो वो भी अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकेंगे। अगर आने वाले समय में भारत - पाक रिश्तों में मिठास पैदा हो जाती है तो केंद्र की मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए के साथ ऐतिहासिक उपलब्धि जुड़ जायेगी, जिनके दूरगामी परिणाम होने की प्रबल संभावनाएं हैं। भारत-पाक रिश्ते अच्छे बनते हैं तो इसकी सफलता का सारा श्रेय नरेंद्र मोदी को ही मिलेगा। खौफज़दा पाक को आतंकवादियों के विरुद्ध मुखरित होने में मोदी की रणनीति बहुत ही अहम भूमिका निभायी है। परिणाम अच्छे या बुरे होंगे ये अभी भविष्य के गर्भ में हैं। (Aawaamee Lehar)




असल राजनीति और भारत पाकिस्तान

NarendraModi/NawazSharif

शुरुआत में जब नयी नयी ‘समझ’ की कोंपलें फूट रही थीं, तब ऐसी कई बातें थीं जो दिमाग के बहुत ऊपर से निकल जाती थीं. भारत जैसे देश में चूँकि चुनाव होते ही रहते हैं, कभी लोकसभा, कभी विधानसभा, कभी ग्राम-पंचायत और इनके बीच में भी तमाम दुसरे चुनाव. इन चुनावों में एक कॉमन बात यह सुनने को मिलती रहती थी कि अमुक पार्टी या अमुक उम्मीदवार ने ‘लाशों पर राजनीति’ करने की कोशिश की है. नहीं समझ आती थीं तब ये बातें… और … ऐसा पहला अनुभव तब हुआ, जब मेरे गाँव में ग्राम पंचायत का चुनाव हुआ. यह 1995 के आस पास का समय था, जब मेरी उम्र 10 साल की थी… बड़े उत्साह से गाँव के प्राइमरी स्कूल पर मैं भी जमा रहा था कि शाम को तकरीबन चार बजे भगदड़ सी मची और … प्रधान पद के एक उम्मीदवार को अपने खून से सने पेट को पकड़े गिरते हुए देखा. दो चार और खून से लथपथ लोग दिखे … जल्द ही लाठियां और बांस हवा में लहराने लगे थे. डर के मारे मैं भागतेMithilesh's poem in hindi, extra zeal for Investment in India, Indian flag हुए घर आया और तब मेरा बालमन यही सोच रहा था कि कहीं मेरी मम्मी और चाची तो वोट देने नहीं गयी हैं. मेरे पहुँचने के थोड़ी देर बाद एक प्रत्याशी का समर्थक भी रोते हुए मेरे घर पहुँच गया और गिड़गिड़ाते हुए बोला कि ‘उ सहबुआ, दतुअन काटे आला छूरी कई आदमीं के भोंक देले बा, अब पुलिस के कई गो गाड़ी आ गइल बाड़ी सन, चल के वोट दे द लो ए रमेशर भइया… कइसहूं जिता द लो… बाद में ए ससुरन के देख लिहल जाइ’… जीवन में पहली घटना का ऐसा प्रभाव होता है कि आज 20 साल बाद भी उस घटना का चित्र हूबहू याद आता है. हालाँकि, उसके बाद तो लगभग हर छोटे-बड़े चुनाव में ‘लाशों पर राजनीति’ की खबरें देखना सुनना आम बात हो गयी. हाँ! जैसे-जैसे चुनाव और राजनीति बड़े होते गए, गाँव की ‘छुरियों’ का स्वरुप भी बंदूकें, एके-47, बम, दंगे, रासायनिक हथियार और परमाणु हथियारों तक में परिवर्तित होता गया. इसी कड़ी में प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव हैं, जिसका अध्ययन वैश्विक राजनीति को समझने के लिए आवश्यक है. इन दो युद्धों, विशेषकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद गठित संयुक्त राष्ट्र संघ में कई देश अक्सर अपनी राजनीति को साधने के लिए मोहरे के रूप में कई देशों को आगे बढ़ाते रहे हैं. बेशक, वह मोहरा कुर्बान हो जाय, देश बर्बाद हो जाय! थोड़ा और स्पष्ट करें तो, विश्व में आज के समय में ‘सीरिया संकट’ सबसे बड़े संकट के रूप में दिख रहा है. लाखों की संख्या में शरणार्थी समस्या और उस पर अरब देशों का विपरीत रूख, अमेरिका रूस इत्यादि की अस्पष्ट नीतियां देखने के बाद, लगभग महीने भर तक यह समस्या मुझे ठीक से समझ ही नहीं आयी कि आखिर ‘सीरिया संकट’ की जड़ में है क्या? संयुक्त राष्ट्र की महासभा में जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने संयुक्त राष्ट्र की महासभा में कहा कि इस्लामिक स्टेट चरमपंथियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में ‘सीरिया की सरकार’ की मदद न करना एक बड़ी भूल है, तब इस संकट के पीछे की हवाओं को समझने में मदद मिली. अब इसी के साथ जरा अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का बयान भी देख लीजिये, और राजनीति के मोहरों को समझने की कोशिश कीजिये. ओबामा ने महासभा में कहा कि सीरिया संघर्ष को समाप्त करने के लिए अमरीका, रूस और ईरान समेत किसी भी देश के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है, लेकिन ज़रूरत यह है कि बशर अल असद से सत्ता का कामयाब हस्तांतरण हो…. मतलब, सीरिया में लाखों लोग जान गँवा चुके हैं, करोड़ों बेघर हो चुके हैं, 40 लाख से ज्यादा लोग पलायन कर चुके हैं … और विश्व की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां एक राष्ट्र-प्रमुख को हटाने और बनाये रखने पर राजनीति की चालें चल रही हैं.. कारण चाहे जो भी हो, क्या फर्क पड़ता है… मौत तो बेगुनाहों की हो ही रही है! और चूँकि, मामला दो महाशक्तियों के वर्चस्व का है, इसलिए विश्व के दुसरे देश भी सीरिया मामले पर कन्फ्यूजन में हैं. जाहिर है, इस्लामिक स्टेट को बढ़ावा देना, सीरिया को अस्थिर करना और उसके जरिये अपने हित साधने की कुटिल राजनीति चली जा रही है, ठीक वैसे ही जैसे लादेन को बढ़ावा दिया गया था, या भारत में भिंडरवाले को बढ़ावा दिया गया था, या फिर पाकिस्तान में हाफीज़ सईद, हक्कानी गुट और दुसरे आतंकी समूहों को बढ़ावा दिया जा रहा है. Pakistani Terrorists new target, child and youth for brainwash, hindi article by mithileshइस भूमिका के बाद, अब अगर पाकिस्तान की बात करते हैं तो इस देश की नीतियों के मामले में ऐसा कुछ भी धुंधला नहीं है जो किसी को न पता हो! आखिर, वह हमारा भाई जो रहा है और इसके अलावा चार बड़े युद्ध और 70 सालों की मारामारी ने दोनों देशों के नागरिकों और सरकारों को एक-दुसरे के बारे में काफ़ी कुछ समझा दिया है. हाँ! पाकिस्तान के बारे में एक और बात जो समझने वाली है वह यह है कि एक फटेहाल, लगभग नाकाम देश को इतनी ऊर्जा कहाँ से मिलती जा रही है, जो वह भारत जैसी बड़ी इकॉनमी के सामने खड़े होने की लगातार हिम्मत दिखा रहा है, युद्ध की धमकी देता है, यूएन और दूसरी जगहों पर मुंह फाड़ता रहता है… क्या वाकई, इसके पीछे कोरी भावुकता और दुश्मनी ही है? आइये, एक बार फिर भारत पाकिस्तान के रिश्तों के पन्नों को पलटते हैं… 1947 के बंटवारे की भावुकता में पहली लड़ाई तुरंत ही हुई तो 1965 की लड़ाई में ‘चीन द्वारा भारत की हार’ ने पाकिस्तान को उकसाया. इसके बाद, पूर्वी पाकिस्तान पर अत्याचार के रूप में 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान बुरी तरह टूट चुका था, और शीतयुद्ध के दौर में उसकी कमजोरी का भरपूर फायदा उठाया अमेरिका ने! तब भारत को मजबूरन रूस का साथ लेना पड़ा और एशियाई महाद्वीप में ये दोनों देश वैश्विक राजनीति का दशकों तक मोहरा बने! 1991 में सोवियत यूनियन के विखंडन और भारत में आर्थिक सुधारों की शुरुआत ने वैश्विक समीकरणों को तेजी से बदला और साथ में बदली भारत की छवि! इस बीच 1999 का कारगिल युद्ध जरूर हुआ, लेकिन उसका सबसे बड़ा कारण अटल बिहारी बाजपेयी का पाकिस्तान के प्रति अति ‘भावुक’ दिखना रहा… हालाँकि, इस बात पर विश्लेषक एकमत नहीं रहे हैं और उनके अनुसार एक फौजी जनरल का पागलपन और भारत में तत्कालीन गठबंधन राजनीति का ढुलमुलापन भी पाकिस्तान के दुस्साहस का कारण हो सकते हैं. खैर, उसके बादHindi article on world politics, analysis of India Pakistan relations by Mithilesh, Lal bahadur Shashtri हालात बदले और भारत के आर्थिक उभार के साथ ही, पाकिस्तान तेजी से चीन की गोंद में जा गिरा. तमाम युद्धों में फेल होने और वैश्विक शक्तियों के बार-बार ‘मोहरा’ बनने के कारण पाकिस्तान के आतंरिक हालात जर्जर हो गए तो उस पर परदा रखने के लिए भारत का विरोध और चूँकि सीधा विरोध उसके लिए अब मुमकिन नहीं रहा था, इसलिए आतंक का पोषण उसकी सरकारी नीति बन गयी. इस बीच भारत में हालात लगातार सुधरे और 2014 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के साथ ही राजनीतिक उथल पुथल के दौर से भी भारत एक झटके से बाहर आ गया. अब मजबूत राजनैतिक नेतृत्व, वैश्विक बिरादरी में भारतवंशियों की सशक्त पहचान, सक्षम युवाओं की विशाल फ़ौज, इन्वेस्टर्स का पसंदीदा स्थल और अपनी संस्कृति और भाषायी सक्षमता के कारण भारत आज न केवल चीन, बल्कि रूस और अमेरिका की नज़रों में भी खटक रहा है| चूँकि, अमेरिका द्वारा भारत का समर्थन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि चीन और रूस की आतंरिक खेमेबंदी से निपटने के लिए एशिया में और कोई दूसरा सक्षम है ही नहीं|

अब ज़ाहिर है कि भारत पर लगाम लगाने के लिए इन महाशक्तियों के पास एक ही अस्त्र बचता है, और वह है ‘पाकिस्तान’! और उसके लिए सबसे आसान तरीका है कश्मीर मुद्दा और पाक अधिकृत कश्मीर… इस क्रम में पाक अधिकृत कश्मीर के रस्ते चीन ने भारी भरकम इन्वेस्टमेंट से अपनी बड़ी चाल चल दी है तो कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में हाईलाइट किए जाने से महाशक्तियों का दूसरा उद्देश्य भी पूरा हुआ है. संयुक्त राष्ट्र महासभा के 70वें अधिवेशन में भाषण देते हुए नवाज़ शरीफ़ ने कश्मीर मुद्दे को न सुलझा पाने को संयुक्त राष्ट्र की नाकामी बताते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद के कई प्रस्ताव इस सिलसिले में लागू नहीं हुए हैं. जाहिर है, पाकिस्तान जैसा देश, जो ठीक से लोकतान्त्रिक भी नहीं है, वह संयुक्त राष्ट्र को नाकाम बता रहा है तो इसके पीछे की हवाओं को देखना आवश्यक हो जाता है. नवाज़ शरीफ़ ने इस सिलसिले में और भी काफी कुछ कहा जिसमें भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में लड़ाई के बजाए सहयोग पर बल देना और भारत द्वारा सीमा रेखा पर संघर्ष-विराम का उल्ल्घंन न करने की बातें भी शामिल हैं, जिस पर शायद उन्हें खुद ही यकीन नहीं रहा होगा! खैर, नवाज शरीफ की इन बातों पर भारत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी, जिसमें नयी बात यह थी कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर पाकिस्तान को घेरने का प्रयास हुआ. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरुप ने एक एक करके नवाज शरीफ के यूएन में भाषणों की धज्जियां उड़ाते हुए ट्वीट कर दिए… हालाँकि, इस प्रतिक्रिया से पहले यह समझने की कोशिश की जानी चाहिए थी कि अब तक भारत के अधिकृत रूख में पाक द्वारा कब्जाए गएsecurity council, united nations, uno - hindi article by mithilesh कश्मीर के हिस्से पर इतना कड़ा रूख क्यों नहीं दिखाया गया था? क्या वाकई, पहले की तमाम भारतीय सरकारें इस मुद्दे पर लचर ही थीं, या बात कुछ और थी! भारत ने अपनी प्रतिक्रिया में यह भी कहा कि पाकिस्तान पहले पाक अधिकृत कश्मीर को खाली करे, क्योंकि पाकिस्तानी फौज पीओके में ह्यूमन राइट्स का लगातार धज्जियां उड़ा रही हैं तो वहां विरोध कर रहे लोगों को यह कहते भी सुना जा रहा है कि ‘हम इंडिया जाना चाहते हैं’. पीओके पर लगभग यही बात भाजपा के दुसरे नेता भी कहते रहे हैं. हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र संघ में सुषमा स्वराज के बयान में ज्यादा परिपक्वता दिखी. संयुक्त राष्ट्र में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भाषण देते हुए कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र का पूरा समर्थन करेगा, इसलिए नीले झंडे के तले तमाम लोग काम कर रहे हैं.180000 शांतिसैनिक भारत ने उपलब्ध कराए हैं, जिसमें से 8000 तो काफी चुनौती पूर्ण स्थिति में काम कर रहे हैं. हम अपना योगदान बढ़ाने को तैयार हैं, लेकिन तमाम राष्ट्र जो इस मिशन में अहम भूमिका निभा रहे हैं उनकी निर्णय प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं है. कश्मीर मुद्दे को अनदेखा करते हुए सुषमा ने नवाज को भी साफ़ कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद छोड़े तो भारत ‘द्विपक्षीय’ बातचीत के लिए तैयार है. साफ़ है कि विश्व भर में आतंक के लिए बदनाम पाकिस्तान को ‘आतंक’ के ही नाम पर घेरा जा सकता है, न कि कोई ‘पीओके’ का मुद्दा उठाकर!Hindi article on world politics, analysis of India Pakistan relations by Mithilesh, pakistan and china जाहिर है, पूरे कश्मीर और अपने काफ़िर-नियमों के तहत पूरी दुनिया पर हक़ ज़माने की मंशा वाला पाकिस्तान अपने देश और पीओके के नागरिकों के जीवन-स्तर को नरक से भी बदतर बना चुका है, लेकिन सवाल वही है कि यह बात किसे पता नहीं है? यह बात तो खुद पाकिस्तान के ही कई बुद्धिजीवियों द्वारा समय-समय पर कही जाती रही है कि पाकिस्तान कश्मीर तो मांग रहा है, लेकिन पहले वह पाकिस्तान को ही संभाल कर और उसका विकास करके दिखाए! स्पष्ट है कि चर्चा चाहे जम्मू कश्मीर की हो या ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ की, इस मुद्दे पर भारत की उलझनें बढ़ेंगी ही. पहले भारत इस तरह की चर्चाओं को अनदेखा करता रहा है, यहाँ तक कि कई युद्धों में सीधी हार के बाद भी कश्मीर पर लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी जैसे नेताओं ने बातचीत में ‘इग्नोर’ करने वाला रूख ही अपनाया. यहाँ तक कि अटल बिहारी बाजपेयी ने भी इस मुद्दे को ज्यादे हवा नहीं दी, लेकिन ग्राउंड पर सभी सरकारों ने जबरदस्त ढंग से कार्य किया और आतंक को पूरी तरह से काबू भी किया. बातचीत की इसी ‘इग्नोरेंस नीति’ का ही परिणाम है कि आज भारत एक महाशक्ति के रूप में खड़ा हो रहा है. भारत में मोदी का बड़ा उभार हुआ है तो एक बात यह भी सच है कि पुरानी नीतियों और उसके प्रभावों का हस्तांतरण नए राजनीतिक प्रशासकों को ठीक ढंग से नहीं हो पाया. मोदी इससे पहले एक प्रदेश के नेता रहे हैं तो भाजपा के अन्य वरिष्ठ चिंतक, पुराने नेता साइड किए जा चुके हैं और मोदी की ‘अति मजबूत’ छवि से सुषमा, राजनाथ जैसे धुरंधर भी कुछ कह पाने की स्थिति में Hindi article on world politics, analysis of India Pakistan relations by Mithilesh, yashwant sinhaनहीं हैं. नौकरशाह बिचारे कितना कर सकेंगे, क्योंकि उनका एक निश्चित दायरा होता है जो ‘सेलरी और प्रमोशन’ से जुड़ा होता है. वह अक्सर वही कहते और करते हैं, जिससे उनके आका खुश हों. इसका बड़ा उदाहरण तब मिला, जब ग्रुप-4 के देशों के साथ मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट के लिए लॉबिंग करने का प्रयास किया. अब उन्हें किसी ने बताया नहीं कि सुरक्षा परिषद के लिए भारत का विरोध तो खुले तौर पर सिर्फ पाकिस्तान ही करता आ रहा है, लेकिन जर्मनी, जापान और ब्राजील के कई विरोधी हैं. इसकी आलोचना खुद को ‘ब्रेन डेड’ घोषित करने वाले यशवंत सिन्हा ने तुरंत की. यूं भी, संयुक्त राष्ट्र संघ फोटो खिंचाने भर का मंच ही तो है, अन्यथा कौन देश इस संस्था की बात कब मान रहा है? चीन अपनी मनमर्जी कर रहा है दक्षिणी चीन सागर और हिन्द महासागर में… रूस यूक्रेन में अपनी कर रहा है… तो अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान में अपनी चलाई और जमकर चलायी. सीरिया में संयुक्त राष्ट्र संघ ‘बिचारा’ बना तमाशा देख रहा है और थोड़ी बहुत ‘चैरिटी’ कर रहा है. इज़रायल से लेकर तमाम अन्य देश इस संस्था को ‘टोकन’ भर ही मानते हैं. सोचने वाली बात है कि अगर संयुक्त राष्ट्र संघ ने कश्मीर पर कोई प्रस्ताव पास ही कर दिया तो क्या भारत या पाकिस्तान उसे मानने को बाध्य होंगे? कतई नहीं…!! मुझे यह भी नहीं लगता है कि विश्लेषक इस तर्क से असहमत होंगे कि भारत की पावर वगैर सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य बने ही काफी तेजी से आगे बढ़ रही है. हाँ! एक टैग मिले तो बढ़िया ही है, लेकिन यह टैग इतना बड़ा नहीं है कि उसके लिए फालतू के चोंचले किये जाएँ. ऐसे में कश्मीर मुद्दे पर बेवजह के होहल्ले से परहेज किया जाना चाहिए और बच, बचाके कुछ दशकों तक अपने विकास को रफ़्तार देना चाहिए.. ताकि हम पाकिस्तान जैसे देश से युद्ध की रेंज से काफी आगे निकल जाएँ. इस बात का यह कतई मतलब नहीं है कि हम पाकिस्तान के उकसावे पर कुछ नहीं करें, बल्कि पाकिस्तान के उकसावे के लिए पूरी तरह तैयार रहना और ईंट का जवाब पत्थर से देना ही होगा, लेकिन वगैर शोर शराबा किये .. !! अगर हम शोर शराबा करने लग जाएँ तो पाकिस्तान सहित चीन का मंतव्य ही पूरा करेंगे और खामख्वाह अपनी उलझनें ही बढ़ाएंगे. उम्मीद की जानी चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर पिछली 70 साल की नीतियों का गहराई से अध्ययन करने के बाद ही केंद्र सरकार आगे की नीतियां बनाएंगी. हाल फिलहाल इसमें किसी बड़े बदलाव की आवश्यकता नहीं नजर आती है. हाँ! मोदी बिजनेस और घरेलु मोर्चे पर अपना प्रबंधन खूब दिखाएँ, इसमें उनको महारत भी है, लेकिन विदेश नीति पर कम से कम अगले पांच साल धैर्य बरता जाना आवश्यक है. समय की यही मांग है.. (साभार)