Tel: 9454702940 | Mail: readers@aawaameelehar.com





सेकुलर मच्छरों का संरक्षक नगर निगम...

आज फिर वो बिन बुलाया मेहमान आ धमका भिन्न...भिन्न... करता बेताल की तरह मेरे कंधे पर बैठ गया. अनायास मेरे मुंह से निकल गया, 'लगता है आज कोई मिला नहीं है क्या'. वो मुस्कराया और और बोला,' ऐसा नहीं है यार आज एक बेवड़ा मिल मिल गया था, उसी से मुझे भरपूर भोजन मिल गया. मैं हंसते हुए बोला, 'यार तुम चूसते खून हो, और बताते भोजन हो, कुछ समझ में नहीं आया. वो तपाक से बोला, 'यार खून ही हमारे लिए भोजन है, एक बात बताओ ये बेवड़े इतना राजस्व देते है सरकर को तो इनके लिए शेल्टर होम टाइप के क्यों नहीं बनवाती है,ताकि ये बेसुध हो जाने पर वहां शरण ले सकें.कुछ सोच कर मैंने उस सेकुलर मच्छर से पूछ लिया, 'बड़ा प्यार उमड़ रहा है, इन लोगों पर. इस पर वो बोला,'अच्छा एक बात बताओ, गरीबों के इलाज के लिए अस्पताल खोलते हो,तो इनके लिए ऐसा क्यों नहीं करते हो. मैनें थोड़ा गुस्से से कहा, ' ऐसा करके क्या इन्हें ज़्यादा पीने के लिए प्रोत्साहित करें. वो थोड़ा दार्शनिक अंदाज़ में बोला, 'ये बात नहीं यार मैं इसलिए कह रहा था कि इनसे सरकार सबसे ज्यादा राजस्व कमाती है, तो इन्हें कुछ तो सुविधा दी जानी चाहिए. दारु जैसी बुरे चीज़ को ढोने वालों को तुम सुविधा देने की बात कर रहे हो, इनके परिवार के लोगों से पूछो जो इनकी दारु बाज़ी के चक्कर में आधा पेट भोजन कर पाते हैं, इसके बारे में सोचा है. वो तपाक से बोला, 'यही मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता था. फिर उसने खरी-खरी सुनानी शुरू कर दी. 'अगर शराब या दारु बुरी चीज़ है तो सरकार बंद क्यों नहीं कर देती और तुम्हारी पत्रकार बिरादरी इसका पुरज़ोर विरोध क्यों नहीं करती. सब बुराइयों को छापते और चैनल्स पर दिखाते हो लेकिन इससे परहेज़ क्यों. कभी इस बुराई के खिलाफ आवाज़ उठाते नहीं सुना तुम्हारी बिरादरी को. ये कैसा ढोंग है. क्या अच्छा, क्या बुरा का चुनाव करने वाले तुम लोग कब से हो गए. बोलते हुए उसकी आवाज़ लड़खड़ाई, फिर सँभालते हुए बोला लगता है उस बेवड़े ने नक़ली दारु पी राखी थी इसलिए कुछ अजीब सा लग रहा है. उसकी बात सुन हंसते हुए पूछ लिया, 'अब तो तुम भी इनकी बिरादरी में शामिल हो गए हो, यह बात मैंने थोड़ा व्यंगात्मक स्वर में कही तो वो मुस्कराया, 'यार मैं पहले ही कह चुका हूँ की हम मच्छर बिरादरी सेकुलर होते हैं. हमारे लिए भूखे से लेकर गले -गले तक भरे सभी एक बराबर होते हैं. ...और हम दोनों ही जोर से हँसे. अचानक वो बातों का सिलसिला बदलते हुए बोला, 'खैर छोड़ो यह बताओ तुम कर क्या रहे थे. 'कुछ नहीं न्यूज़ देख रहा था. 'क्या समाचार हैं मेरी बात ख़त्म होने के पहले ही पूछ बैठा. ख़ास कर यूपी के आगामी चुनाव पर क्या मसाला है पर बताओ. इस पर मैं बताने लगा कि कांग्रेस की तरफ से पीके मैंदान में उतरे हैं. वो कुछ असमंजस से बोला 'यार ये पीके चुनाव मैदान, क्या ये बिना पिए नहीं उतर सकते थे. यह सुन मेरा हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया. हंसी रुकने पर मैंने बताया मेरे सेकुलर बिरादरी के मच्छर जी ये पीके नाम से हैं प्रशांत किशोर इनका पूरा नाम है. ये कांग्रेस को अपनी राजनीतिक रणनीति से यूपी की सत्ता पर बैठाने के लिए लाये गए हैं. वो कुछ सोचते हुए बोला, 'क्या यार इस तरह से भी सत्ता पर काबिज़ हुआ जा सकता है.

मैंने कहा, 'पता नहीं पर पीके कुछ ऐसा की करते हैं'. थोड़ी देर के विराम के बाद वो सेकुलर प्राणी बोला, 'यार अखिलेश के विकास और मोदी के विकास और सुधार कार्य क्या जनता के लिए कोई मायने नहीं रखते हैं, गधे तो गधे होते हैं, मनुष्य तो बुद्धिमान होता है. वो तो इस बात को समझ सकता है कि कुछ अच्छा हुआ है या नहीं हुआ है'. मैं उसकी इन बातों से थोड़ा बैकफुट हुआ और बोला,'यार कई दशकों से तो प्रदेश में जाति और धर्म के नाम पर ही कोई भी व्यक्ति यूपी का राजा बनता आया है. लेकिन इस बार कुछ नया और अच्छा होने वाला है. चुनाव विकास के मुद्दे पर ही होना है. मैं फिर बोला देश में अगर मोदी जी विकास और सुधार की बात कर रहे हैं तो यूपी अखिलेश भी विकास किये जाने का दावा कर रहे हैं'. मेरे चुप होने पर वो बोला, 'और बसपा की क्या स्थिति है, हवा तो यही थी कि २०१७ के चुनाव में मायावती जीत दर्ज करेंगी और ये भी तक होता आया है'. कुछ सोच कर मैंनें उस प्राणी से कहा, 'तुम बात दमदार कह रहे हो लेकिन लोकसभा चुनाव में बसपा की बुरी तरह से हार हुई थी. एक भी बसपाई दिल्ली नहीं पहुँच पाया था, क्योंकि मोदी ने यूपी में लोगों से विकास के मुद्दे की ही बात की थी,जिसे जनता ने समझा और ४२ विधानसभा सीटें जीतने वाली भाजपा को ७१+२ लोकसभा सीटें जिता दी थीं. ऐसे ह्रदय परिवर्तन से तो यही लग रहा है कि यूपी की जनता को भी जाति और धर्म की राजनीति से अच्छी लगी विकास की राजनीति. बस इसीलिए बसपा की स्थिति थोड़ा कमज़ोर है. विकास के नाम पर पिछली बार कंक्रीट का जंगल ही बनाया था. बात की थी सर्वधर्म हिताय की. यह बात सुनकर मिस्टर सेकुलर थोड़ा उत्तेजित होते हुए बोले, 'हाँ यार सही कह रहे हो नदी, नाली और पानी भरे गड्ढे और झाड-झंखाड़ को उजाड़ कर पत्थर बिछावा दिये थे जिससे हमारे आशियाने ख़त्म हो गए थे,जिस कारण मेरी बिरादरी को बहुत कष्ट हुआ था. फिर भी वो बोलता गया, अच्छा ही है कि विकास के नाम पर मतदान हो तो कुछ सुधार होगा, लेकिन कुछ सेकुलर झंडाबरदार सत्ता के लिए जाति और धर्म को ही लेकर अपनी ज़मीन तलाश रहे हैं. फिर अचानक चुप होते हुए बोला यार मुझे क्या है, कोई भी यूपी की सत्ता पर काबिज़ हो मुझे तो भरपेट भोजन मिलना ही है. इन्हीं तथाकथित सेकुलरों की वज़ह से ज़िंदा भी हैं क्योकि जीतने के बाद भी ये नगर निगम में सुधार नहीं करते हैं और ये बाबू लोग पेट को गले तक भरने के लिए फागिंग स्मोक से हमें मारते नहीं हैं. अब तो इतनी मिलावट होने लगी है कि इस धुंए की बदबू हमें बहुत भाने लगी है. हम मच्छरों के लिए सत्ता परिवर्तन कम नगर निगम के अधिकारी का बदलना मायने रखता है. जिस दिन नगर निगम अपनी मानवता पर उतर आया तो हम मच्छरों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा. फिर वो मेरी तरफ देखते हुए बोला, 'मुझे पता है तुम बिके हुए माल हो और इस विभाग में सुधार की बातें नहीं करोगे और एक कुटिल मुस्कराहट के साथ वो भिन्न....भिन्न... आवाज़ के साथ उड़ते हुए बोला, फिर आउंगा, इंतज़ार करना. मैं मुस्कराता हुआ एक सच्चे सेकुलर को उड़ान भरते हुए देखता रहा.(आवामी लहर)




भारत के मच्छर टाइप धर्मनिरपेक्ष...

कल रात मेरी जगह कोई भी होता वो भी डर से कांप जाता. रात करीब 8 बजे होंगे मैं फेस बुक में चहल-कदमी कर रहा था कि ठीक कंप्यूटर स्क्रीन के ऊपर के स्थान पर एक मच्छर जैसी भीमकाय सी आकृति आकर बैठ गयी. पहले तो मैं डरा, फिर मैंने उसे परलोक भेजने के लिए मेज़ पर रखी पत्रिका को को मोड़ कर हमला बोलने की सोच ही रहा था कि मुझे एहसास हुआ कि किसी ने मेरा नाम लिया. थोड़ा सकपकाने के बाद देखता क्या हूँ कि कंप्यूटर स्क्रीन पर बैठा प्राणी आगे के दोनों पैर उठाकर कुछ बोल रहा है. मैं कुछ सोचता उसके पहले ही वो 'बोला डरो नहीं भाई मैं परजीवी प्राणी मच्छर हूँ'. डर निकल जाने पर मैं भी दोस्ताना अंदाज़ में उससे बोला यार तुम इतने हट्टे-कट्टे कैसे हो, जबकि तुम्हारी बिरादरी के लोग ऐसे नहीं होते हैं. इस पर वो हंसा और बोला दोस्त क्या कह सकता हूँ, सब तुम मनुष्यों की मेहरबानी है, क्योंकि आज-कल तुम लोगों का खून पीने को खूब मिल रहा है. खास कर इन महामारी की तरह फैले गरीबों का, इसके आगे वो कुछ बोलता मुझे गुस्सा आ गया, मैं आवेश में बोला, 'एक तो तुम इन गरीबों का खून पीते है, उस पर इन्हें महामारी कह रहे हो, जबकि तुम्हारे कुटुम्ब के लोग हम लोगों को कई तरह की मच्छरजनित बीमारियाँ दे देते हैं और हज़ारों इंसान अपनी जान गंवा देते हैं. वो चुपचाप सुनता रहा, जब तक मैं बोलता रहा वो वो सुनता रहा, जब मैं चुप हुआ तो वो बहुत ही मासूमियत से बोला, कह चुके या कुछ बाक़ी है. मैंने न में सर हिला दिया. तुम इस समय क्या कर रहे थे. मैंनें कहा फेस बुक पर आयीं पोस्ट पर कमेंट्स दे रहा था. इस पर वो मच्छर मुझे शिक्षा देने लगा कि कुछ अच्छे कार्य करो, डाटा रिचार्ज में महज़ धन का अपव्यय करते हो. मैनें कहा यार अभी मैंने एक मुस्लिम लड़की की बीमार माँ के लिए शीघ्र स्वस्थ हो जाने के लिए भगवान से प्रार्थना की है. वो एक कुटिल मुस्कान के साथ बोला, लगता है तुम्हें भी तथाकथित सेकुलर बनने की बीमारी है. यह सुन मेरे गुस्से का की इंतिहा ख़त्म हो गयी, मेरा हाथ मोड़ कर राखी पत्रिका की तरफ बढ़ गया,कि अब इसको ख़त्म ही कर देना है. वो तुरंत उड़ने के लिए सतर्क हो गया और बोला क्यों यार इस बात पर नाराज़ क्यों हो गए. मैंने उसी गुस्से के अंदाज़ में जवाब दिया कि इंसानियत के नाते मैंने एक बुजुर्ग माँ के लिए दुआ करी है, तुम मुझे तथाकथित सेकुलर कह रहे हो. वो बोला 'चलो बोतल में रखा पानी पियो और गुस्सा शांत करो'. कुछ देर कमरे में सन्नाटा पसरा रहा, फिर वो बहुत ही कुटिल मुस्कराहट के साथ बोला तुम मनुष्यों से कहीं अधिक सेकुलर तो हम मच्छर हैं. मुझे उसकी इस बात पर हंसी आ गयी और पूछ लिया वो कैसे ? वो बोला, 'हम किसी का धर्म देख कर खून नहीं चूसते हैं चाहे वो हिन्दू,

मुसलमान, सिख और ईसाइ हो सबका खून हमारे लिए सर्वाइव करने का ज़रिया मात्र हैं. भूखे मर जाए,कभी भी हम अपनों का खून नहीं चूसते हैं. कभी भी किसी पर हमला करते हैं तो कोई भी चालबाजी या उसके भोलेपन फ़ायदा नहीं उठाते हैं. हमेशा अपनी सांकेतिक भाषा में भिन्न...भिन्न...करके के उसे चेतावनी दे देते हैं. वो बचना चाहे तो ठीक, वरना खून पिलाने के लिए तैयार रहे. तुम सेकुलर लोग तो गरीब इंसानों को मूर्ख बनाकर उनके खून का इस्तेमाल अपनी लालसा पूरी करने के लिए करते हो. इतना ही नहीं तुम लोगों का सेकुलरिज्म और विचार जगह के अनुसार से बदलते रहते हैं. जब-तब तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़ लेते हो. जब-जब तुम्हारी लालसायें बलवती होती हैं. हम तो हमेशा ही खून चूसने की तालाश मनुष्य को खोजते रहते हैं, पर तुम्हारे सेकुलरिस्ट चुनाव के समय ही जागते दिखाई देते हैं. जब सत्ता सुख मिलने लगता है तो मीठी नींद लेने लगते हो. सेकुलर बनकर तरह-तरह से गरीब जनता को आश्वासन देते हो. वो बेचारे इस झांसे में आकर अपने-आपको 5 साल के लिए तुम जैसे सेकुलरों को सौंप देते हैं. यही प्रक्रिया फिर 5 साल बाद शुरू करते हो. मरता क्या न करता की तर्ज़ पर कोई विकल्प न होने के कारण बेचारी जनता तुम लोगों की लच्छेदार बातों से फिर तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के झांसे में फंस जाती. तब गरीबों का दर्द महसूस नहीं होता है. हमारे ज़रा सा खून चूस लेने पर इतना हो हल्ला करते हो कि हम मच्छर जाति को आत्मग्लानि होने लगती है कि हम जो कर रहे हैं वो गलत है, लेकिन तुम सेकुलर अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जनता पर तरस भी नहीं खाते हो. अगर कोई 'डेंगू' की बीमारी से मरता है तो हमारे खिलाफ भी अभियान चला देते हो, जबकि मेरी फैमिली मलेरिया मच्छरों का इस बीमारी से कोई वास्ता नहीं होता है. 'डेंगू' पर तो इतना बवाल करते हो पर 'दंगे' पर चुप्पी साध लेते हो. अब-तक जितनों को तुम सेकुलरों ने मारा उससे न के बराबर लोग 'डेंगू' या 'मलेरिया' से मरे होंगे. वो मच्छर बोल रहा था और मैं सुन रहा था. एकदम से वो मौन होते हुए बोला, ये तो बताओ तुम हो किस दल के तथाकथित सेकुलर. अब मुझे गुस्सा नहीं आया मैंने उसे मुस्कराते हुए जवाब दिया,'यार मैं अदना सा पत्रकार हूँ, तो उसने कहा तब तो यार तुम बिकाऊ माल हो. तुम तो सेकुलरों से भी ज़्यादा सतहे मनुष्य हो. तुमको ये ज्ञान की बातें बताकर अपना समय बेवजह बर्बाद किया, वरना अब तक कितने ही लोगों का सेकुलरों की तर्ज़ पर खून चूस चुका होता, और वो ज़ोरदार भिन्न- भिन्न की आवाज़ करता हुआ दरवाज़े से बाहर उड़ लिया और जाते-जाते कह गया, इंतज़ार करना मौका मिला तो फिर आऊँगा. भारतवासियों की जय. (आवामी लहर)




हमारे देश का दुर्भाग्य...

करीब एक दशक पहले मैंने एक कलम के ईमानदार सिपाही का लेख पढ़ा था .इस लेख में उन्होंने महान वैज्ञानिक और राष्ट्रपति पद की गरिमा बढाने व इस पद को नए आयाम देने वाले मिसाइलमैन डॉक्टर एपीजे कलाम के आज के महान पत्रकारों (तथाकथित) के साथ एक बड़े हॉल में हुए वार्तालाप के दौरान, कलाम साहब के एक सवाल को ही उन्होंने लेखनी से शब्दों में पिरोकर लेख की रचना की थी. छोटे- बड़े सभी साइज़ के पत्रकारों से भरे इस बड़े से हॉल में राष्ट्रपति कलाम ने वार्तालाप के दौरान पत्रकारों की तरफ एक सवाल उछाला. जिसके बाद सब्ज़ी मंडी बने हॉल के माहौल में सुई पटक सन्नाटा (पिन ड्राप साइलेंस)पसर गया. उछल -कूद कर अपनी बुद्धिमानी का परिचय देने वाले पत्रकारों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था, सभी एक दूसरे का मुंह ताकने लगे जैसे की कबाड़ी पुराने सामान को देखता है. शायद चौथे स्तम्भ को कलाम साहब मुंह से निकले शब्द बाण की उम्मीद नहीं थी. मेरी सोच कहती है कि इन चौथे स्तम्भ की ईंटों को इस सामान्य से माहौल में ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी. शायद यह एक डेड ओनेस्ट व्यक्ति के व्यथित मन की अभिव्यक्ति थी. शायद इन चापलूसों की, लोमड़ी की तरह चालाकी, गीदड़ की तरह एक स्वर से किसी गलत को सही ठहराने की प्रवृति का पूर्ण रूप से ज्ञान हो चुका था. गीदड़ के बारे में आप को बताता चलूँ. अगर एक या दो गीदड़ किसी शिकार को देखते हैं उसको मारकर खाने के लिए व् हमला करते हैं. अगर वो ताक़त में जबर पड़ता है तो वो शिकार से थोड़ी दूरी पर बैठ कर आसमान की तरफ मुंह उठाकर खूब तेज़ आवाज़ में हूँ...हु....की अजीबो गरीब आवाज़ निकाल कर अपने साथियों को बुलाने लगते हैं. अरे यार मैं भी कहाँ जंगल में पहुँच गया. उस खचाखच गीदड़ों सॉरी पत्रकारों से भरे हॉल में मेरे श्रद्धेय काका कलाम ने इनसे सवाल किया कि 'क्या स्वच्छ पत्रकारिता बुरा व्यवसाय है' इन शब्दों ने गरम पिघले शीशे से भी ज़्यादा इनके कानों को जला डाला था. शायद इन गीदड़ों के पास कोई जवाब नहीं था. यह बात आज मैं इसलिए कह रहा हूँ,क्योंकि रोज़ रात को न्यूज़ चैनल्स की पंक्तिबद्ध श्रंखलाओं के बीच अभिमंन्यु की तरह घिरा पाता हूँ. सभी अपना भोपूं लेकर चूहे मार, खटमल मार, मच्छर मार, तो कभी देर तक टिके रहने की शक्तिवर्धक दवा आदि सड़क किनारे बैठे मदारी की तरह बेचते से दीख पड़ते हैं.

ये कभी दादरी, तो कभी बीफ,तो कभी रोहित वेमुला, तो कभी जेएनयू का स्वतंत्रता सेनानी कन्हैया+उमर आदि जैसी इंसानियत भक्षक दवाएं बेचते दिखलाई पड़ते हैं. आज-कल मोदी मार, हिन्दू मार, आरएसएस मार आदि के लिए कां.+क.+आ. इन कंपनियों की बनायी दवा को बेचने के लिए अपनी दुकान सजाये टीवी पर रोज़ दिखाई देते हैं. आप सोच रहे होंगे कि इन दुकानदारों क्या फ़ायदा है. इन्हें फ़ायदा नहीं देखिये, इन्हें करोड़ों रुपये का घटा हो चुका है, बीते दो साल में. कहते हैं नशा बहुत बहुत ही खतरनाक होता है. गुलाम भारत को आज़ादी दिलाने का नशा जब चदा तो ब्रिटिश को भागना ही पडा. आज-कल देश को भ्रष्टाचार से मुक्त भारत बनाने का नशा फिर एक गुजराती पर सवार हो गया है. स्वच्छता अभियान चलाकर उसने सांकेतिक रूप से इन्हें बता दिया था सुधर जाओ नहीं तो सुधार दूंगा. लेकिन इन मनचले टाइप के नेताओं में सुधार कैसे होता. किसी भी चीज़ का नशा बहुत कुत्ती चीज़ होता है, यह मैं पहले ही बता चुका हूँ. बस फिर क्या था इन तिकडमबाजों ने इसे ही सुधारने का मन बना लिया और नित नए नौटंकी बाजों को परदे के पीछे से छोटे परदे के कृपा पात्र चम्मुओं को साथ मिला कर दो नौटंकियों से असहिष्णुता का राग सुनाया वो फेल, फिर फिर कुछ कृपा पात्र साहित्यकारों से नौटंकी करवाई वो भी फेल, लाशों पर नौटंकी की वो भी फेल. हताश और निराश इन नौटंकीबाजों ने दिल्ली जैसा कोई टेलेंटेड नौटंकीबाज ढूँढना शुरू किया तो जेएनयू में कुछ अजगर टाइप के नोटंकीबाज़ मिल गए. कॉमेडी का टच लिए इस नौटंकी में एक्शन का तडका राष्ट्र भक्त कुछ वकीलों ने दे दिया.लिखी स्क्रिप्ट के विपरीत जब एक्शन आ गया तो इस नौटंकिये की सीटी चढ़ गयी. इस नए नौटंकिये को ये लोग सही तरह से लांच नहीं कर पाए. या ये खुद डर गया. कहते हैं पुलिस के हत्थे चड़ने का मतलब है कि यातो सुधर जाओ या फिर पूरी तरह से बिगड़ जाओ. अब छोटे परदे के नौटंकीबाज़ डैमेज कंट्रोल करने में लगे हुए हैं. अब मुद्दे पर आता हूँ सोचिये हमारे महान पूर्व राष्ट्रपति ने इन तथाकथितों को कितनी जल्दी पहचान लिया. जिन्होंने एक दशक पहले ही इन्हें पहचान लिया. काका कलाम की इस बात से शायद ही कोई वाकिफ होगा कि उन्होंने इन गिरोह बंद लोगों को सबसे पहले पहचाना था. बुरी नज़र वालों तुम्हारा मुंह कल... आप लोगों से 'चैन से सोना हो तो जागते रहो'. (आवामी लहर)




शाबाश ! मेरे युवा छात्र...

'ये हमारे देश का दुर्भाग्य है'। 'ये दुर्भाग्य भारत के ही हिस्से में आया है' और 'ये दुर्भाग्य भारत की उस पढ़ -लिख कर माँ-पिता का सहारा बनाने वाले युवा के ही हिस्से में आया है;। यह फैसला मेरे लिखी इन बातों को पढ़ने के बाद कीजियेगा। मेरे एक मित्र हुआ करते थे। उनका करीब ८ वर्ष पहले देहांत हो गया था। उस समय उनकी बेटी हाई स्कूल में और बेटा आठवीं का छात्र था। इन दोनों बच्चों। बचत के नाम पर कुछ लाख रुपया। दोनों बच्चों की ज़िम्मेदारी विधवा माँ पर थी। इस भूमिका को उस माँ(मेरे मित्र की पत्नी) ने बाखूबी निभायी। बेटी बी-टेक और बेटे को बीसीए की शिक्षा दिलवाई। बेटी आज किसी कॉलेज लेक्चरार हो गयी है और बेटा भी अपनी पढ़ाई पूरी करने की आखिरी सीढ़ी पर है। कॉलेज कैम्पस आने वाली एक कंपनियों में एक ने उसका चयन किया है।रिजल्ट में समय है। यह बात मेरे मित्र के बेटे ने बतायी। जिस वेब साइट अवामी लहर न्यूज़ / व्यूज़ के माध्यम से मैं आप को ये लिख कर पड़ने के लिए परोस रहा हूँ, ये वेब साइट इसी टैलेंटेड बच्चे की डेवलप की हुई है। इसीलिए मैं उसके या यूँ कह सकते हैं कि वो मेरे करीब रहा। कुछ ही दिन पहले जब मैनें उससे पढ़ाई के बारे में पूछा तब उसने ये सब बताया था। जब कंपनी के ले जाने की बात पूछी तो बताया कि हाँ ले जायेगी। उसकी प्रतिभा के अनुरूप ही मैनें, उससे कहा ८ लाख रुपये पर एनम तो मिलेगा ही। वो मेरी तरफ देख कर बोला अरे नहीं चाचा (अंकल) साल के १८० हज़ार देगी।

जब ये जेएनयू देशद्रोह और एक आतंकवादी को महिमा मंडित करने नारे लगाये गए और इस मामले में गिरफ्तार किये गए छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की उम्र और पढ़ाई के नाम पर मिलने वाली भारी- भरकम रक़म स्कॉलरशिप के रूप में मिलने की बात पता चली तो देश के इस दुर्भाग्य पर बहुत ही हैरानी हुई। एक २० वर्षीय मेरे मित्र का बेटा जिसकी विधवा माँ ने जैसे-तैसे उसको पढ़ाया-लिखाया, उसको निजी क्षेत्र की कंपनी उसके दिमाग को निचोड़ कर १ लाख ८० हज़ार रु. एक साल में देगी। वहीँ जेएनयू के कलंकित छात्र को जो देशविरोधी गतिविधियों में लिप्त पाये जाते है को ३ लाख रुपये स्कॉलरशिप दी जाती है। क्या ये देश का दुर्भाग्य नहीं कहा जाएगा ? आज के इस सढ़े-गले सिस्टम के लिए कौन है ज़िम्मेदार ? कन्हैया कुमार, उमर खालिद, अनिर्बान आशुतोष आदि जैसे रीढ़हीन को महान कहलाने के लिए कौन हैं ज़िम्मेदार? जेएनयू सरीखी शिक्षण संस्थाओं में ऐसे सड़े-गले सिस्टम को निर्बाध गति से चलते रहने देने के लिए कौन है ज़िम्मेदार? नकारात्मक राजनीति करके सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाने देने के लिए कौन है ज़िम्मेदार से शायद ही इसका जवाब किसी के पास होगा। ऐसा इसलिए है कि हम नपुंसक हैं, क्योंकि हमने इन पंक्तियों को आत्मसात कर लिया है कि चलता है, जाने दो। अगर सर्वाइव करना है तो आगे आना ही पडेगा। (आवामी लहर)




...वाह ! रे देश के झंडाबरदारों

क्या रे देश के झंडाबरदार तथाकथित मीडिया और मास्टरों, अपने विद्यार्थियों से विद्या की अर्थी निकलवा रहे हो. फेस बुक पर एक विडिओ वायरल हुआ, इसमें एंकर जेएनयू में क्या हुआ पर सवाल कर रही थी, सभी एक स्वर से कह रहे थे की गलत हुआ. छात्रों को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए था. उनका तो कैरिअर चौपट हो गया आदि -आदि बता रहे थे. कुल मिलकर मुझे भी लगा की गलत हुआ. फिर इस चतुर नार एंकर ने जो सवाल किया उसके बाद मुझे विद्वानों को मास्टर कहने में भी रास्ट्रीय शर्म महसूस हो रही है. जिन्होंने इन्हें शिक्षा दी या दे रहे. इतनी तो मेरे प्रदेश नगर निगम स्कूल के मास्टर भी छात्रों को अपने भारत के आदर्शों महापुरुषों की जानकारी देते रहते हैं. दिल्ली के कॉलेज के मास्टर जो कि झउवा भरकर मोटा वेतन लेने के बावजूद उन्हें समय समय पर शिक्षा देने के साथ समाचार पत्र भी पड़ने के लिए भी नहीं कहते हो, या फिर उन्हें इस तरह की उटपटांग जानकारी तुम ही लोग देते हो. मुझे तो ये सब देख सुनकर लगा कि ये विद्यार्थी ज़रूर इस शब्द का संधि विच्छेद करके विद्या+अर्थी कर देंगे (जो विद्या की अर्थी उठाये वो विद्यार्थी कहलाता है) पहले एक बार मैनें ये विडिओ ऐसे ही ह्यूमर के तौर पर देखा. इस ह्रष्ट-पुष्ट एंकर (एंकर डिअर बुरा ना मानना मैं प्यार से संबोधित कर रहा हूँ) के इस प्रश्न पर कि अफ़ज़ल गुरु कौन था के उत्तर पर इतने अच्छे ज्ञान का प्रदर्शन किया की मैं ये सोचने पर मजबूर हो गया की विद्या का मंदिर कहे जाने वाले विद्यालयों में क्या पढाया जा रहा है. देश की सबसे बड़ी पार्टी के नेता राहुल गाँधी (जिनके परदादा जवाहर लाल नेहरु नाम पर इस महाविद्यालय का नाम रखा गया) भी आज-कल धरना मैन के साथ मिल कर चिल्ल-पौ मचाये हुए हैं कि बीजेपी जे.एन.यू. को बदनाम करने पर तुली है. मुझे तो लगता है कि इन दोनों को भी कुछ ये मालूम है कि अफ़ज़ल गुरु आतंकवादी नहीं बल्कि बहुत महान भारतीय क्रिकेटर था. क्योकि राहुल जी कितना पढ़े-लिखे हैं मैं नहीं जानता लेकिन इनके सुर के साथ कोरस गाने वाले गरीबों के मसीहा (बिजली और पानी का बिल आधा करने वाले) दिल्ली की जनता के दर्द में घुल-घुल जाने वाले, युगपुरुष जी (यार फेस बुक में तो इन्हें यही कहा जाता है.) का तो पता है कि ये पढ़े-लिखे हैं. ये मैं इसलिए दावे से कह सकता हूँ क्योंकि इन्होंने गरीब देश की गरीब जनता का छलकता दर्द देखकर आईआरएस की जॉब छोड़ दी थी.

किसी के दर्द से इतना द्रवित होते हुए किसी को पहली बार देखा था. आइये अब इन्हें सीएम बनाने वाले युवाओं की तरफ रुख करते हैं. वीजे ने इन युवाओं से हिंदी-इंग्लिश दोनों में पूछा कि अफजल गुरु कौन था? किसी ने कहा बहुत बड़े नेता थे, तो किसी ने उसे पोएट, किसी ने कहा आई डोन्ट नो, एक विद्वान् विद्यार्थी ये बोला कि वो बम्ब काण्ड या किसी गाँधी की हत्या में शामिल बताया. और इनमें सबसे कॉमेडी टाइप का जवाब देने कि पराकाष्ठा एक हीरोइन बनी लड़की ने पार कर दी जिसके चेहरे से लग रहा था कि ये ज़रूर किसी महाज्ञानी परिवार से सम्बंधित है. उसका जवाब सुनकर क्रोध और हंसी आएगी. उसने कहा अफजल गुरु शहीद भगत सिंह के समकक्ष थे. ये जवाब मुझे क्या सभी को हंसाता तो है लेकिन इसके पीछे के अँधेरे को देखने की ज़रुरत है कि जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय में इन युवाओं को कौन इस तरह की बातें बता कर बरगला रहा है की अफ़ज़ल गुरु महान था. बाद में इस छात्रा ने ये भी कहा की इस बात की फेस बुक से ये जानकारी मिली. वैसे भी आतंकवादियों के संपर्क का माध्यम इन्टरनेट ही होते है. खैर इस बात पर हंसीं गुस्सा दोनों आता है लेकिन बच्चे तो बच्चे बाप रे बाप...संसद में चल रही कार्रवाई के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया के श्रीमुख से बहस के दौरान यह सुनकर की अगर अफ़ज़ल आतंकवादी है तो उसे गिरफ्तार करो, तब सत्ता पक्ष के सांसद ने बताया की उसको फांसी दे दी गयी है. जेएनयू में अफ़ज़ल को महिमा- मंडित करने और राष्ट्रविरोधी नारों की सच्चाई जानने पर बनायी गयी ये वीडियो मज़ाक मज़ाक में बहुत सारे सवाल उठाती नज़र आती है कि क्या हमारे देश के उन युवाओं को बरगलाया जा रहा है, जो सिर्फ नौकरी पाने की ज़दो-ज़हद में पढ़-लिख रहे हैं. विश्व-विख्यात जेएनयू और अन्य महा विद्यालयों में क्या आतंकवादियों की घुसपैठ चल रही है. किसी भी मूर्ख को महामूर्ख बनाया जा सकता है जैसा की रोहित वेमुला के सुसाईट के बाद और जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारों के बाद सामने आया है. सतही और घटिया राजनीति करने वाले भी थोड़ा सावधान हो जाये, कहीं ऐसा ना हो कि सीमा पार साज़िश रचने वाले इन नेताओं को वहां के युवाओं को अपना हमदर्द बताये और आतंकी घटना में उनसे पूरा सहयोग मिलने का आश्वासन देकर यहाँ भेज दें. उसके बाद क्या होगा इन तथाकथित नेताओं का ये तो भविष्य के गर्भ में हुआ है. (आवामी लहर)